माँ मैं क्या कहूँ, शब्दों की बस कमी सी है,
तुम महान हो, ईशवर हो तुम अगर कहूँ,
तुम्हे खोने के डर से सांस बस थमी सी है।
रिश्तों की बारिश में अपनों का समुन्दर भी होगा,
सपनो के महल ,जवानी का परिंदा भी होगा ,
पर इनमे वो चमक कहाँ जो माँ के होने से मिलेगा।
मस्जिद में खुदा और मंदिर के आरती का धुंआ,
खोजते हैं हम जिसे शहर-शहर, गली-गली,
माँ में छुपा है वो जिसकी तलाश है यहाँ वहाँ।
उसके आंसुओं को देखकर इन आँखों में बस नमी सी है,
माँ मैं क्या कहूँ शब्दों की बस कमी सी है ,
तुम्हे खोने के डर से सांस बस थमी सी है।
Monday, December 21, 2009
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